श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

निमित्ते सति सर्वत्र जलादावपि पूरुषः।

आत्मनश्‍च परस्यापि भिदां पश्यति नान्यदा॥ २९

nimitte sati sarvatra jalādāvapi pūruṣaḥ|

ātmanaśca parasyāpi bhidāṃ paśyati nānyadā|| 29

अर्थ

बाह्य जगत‍्में भी देखा जाता है कि जल, दर्पण आदि निमित्तोंके रहनेपर ही अपने बिम्ब और प्रतिबिम्बका भेद दिखायी देता है, अन्य समय नहीं॥ २९॥

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