श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.28

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

आत्मानमिन्द्रियार्थं च परं यदुभयोरपि।

सत्याशय उपाधौ वै पुमान् पश्यति नान्यदा॥ २८

ātmānamindriyārthaṃ ca paraṃ yadubhayorapi|

satyāśaya upādhau vai pumān paśyati nānyadā|| 28

अर्थ

जबतक अन्तःकरणरूप उपाधि रहती है, तभीतक पुरुषको जीवात्मा, इन्द्रियोंके विषय और इन दोनोंका सम्बन्ध करानेवाले अहंकारका अनुभव होता है; इसके बाद नहीं॥ २८॥

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