राजन्! श्रीमधुसूदन भगवान्के चरणकमलोंके गुणानुवादमें अवश्य ही आपकी अविचल प्रीति है। हर किसीको इसका प्राप्त होना बहुत कठिन है और प्राप्त हो जानेपर यह हृदयके भीतर रहनेवाले उस वासनारूप मलको सर्वथा नष्ट कर देती है, जो और किसी उपायसे जल्दी नहीं छूटता॥ २०॥✎ 410
अस्त्येव राजन् भवतो मधुद्विषः
पादारविन्दस्य गुणानुवादने।
रतिर्दुरापा विधुनोति नैष्ठिकी
कामं कषायं मलमन्तरात्मनः॥ २०
राजन्! श्रीमधुसूदन भगवान्के चरणकमलोंके गुणानुवादमें अवश्य ही आपकी अविचल प्रीति है। हर किसीको इसका प्राप्त होना बहुत कठिन है और प्राप्त हो जानेपर यह हृदयके भीतर रहनेवाले उस वासनारूप मलको सर्वथा नष्ट कर देती है, जो और किसी उपायसे जल्दी नहीं छूटता॥ २०॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.22.20 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 514) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/22/20/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#410 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीभगवान् की → श्रीभगवान्की