श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.22.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 22 · अथ द्वाविंशोऽध्यायः

अथ द्वाविंशोऽध्यायः

महाराज पृथुको सनकादिका उपदेश

मैत्रेय उवाच

जनेषु प्रगृणत्स्वेवं पृथुं पृथुलविक्रमम्।

तत्रोपजग्मुर्मुनयश्‍चत्वारः सूर्यवर्चसः॥ १

janeṣu pragṛṇatsvevaṃ pṛthuṃ pṛthulavikramam|

tatropajagmurmunayaścatvāraḥ sūryavarcasaḥ|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—जिस समय प्रजाजन परमपराक्रमी पृथ्वीपाल पृथुकी इस प्रकार प्रार्थना कर रहे थे, उसी समय वहाँ सूर्यके समान तेजस्वी चार मुनीश्‍वर आये॥ १॥

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