श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.8

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

सूत उवाच

तदादिराजस्य१ यशो विजृम्भितं

गुणैरशेषैर्गुणवत्सभाजितम् ।

क्षत्ता महाभागवतः सदस्पते

कौषारविं प्राह गृणन्तमर्चयन्॥ ८

tadādirājasya yaśo vijṛmbhitaṃ

guṇairaśeṣairguṇavatsabhājitam |

kṣattā mahābhāgavataḥ sadaspate

kauṣāraviṃ prāha gṛṇantamarcayan|| 8

अर्थ

सूतजी कहते हैं—मुनिवर शौनकजी! इस प्रकार भगवान् मैत्रेयके मुखसे आदिराज पृथुका अनेक प्रकारके गुणोंसे सम्पन्‍न और गुणवानोंद्वारा प्रशंसित विस्तृत सुयश सुनकर परम भागवत विदुरजीने उनका अभिनन्दन करते हुए कहा॥ ८॥✎ 1605

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—तदाधिरा०।

     

    (मुद्रित पृष्ठ 506)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1605 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विदुरजी- ने → विदुरजीने

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