॥ श्रीहरिः ॥
पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः।
पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः॥ ६
pūjitaḥ pūjayāmāsa tatra tatra mahāyaśāḥ|
paurāṃjānapadāṃstāṃstān prītaḥ priyavarapradaḥ|| 6
अर्थ
मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया॥ ६॥
पूजितः पूजयामास तत्र तत्र महायशाः।
पौरांजानपदांस्तांस्तान् प्रीतः प्रियवरप्रदः॥ ६
मार्गमें जहाँ-तहाँ पुरवासी और देशवासियोंने उनका अभिनन्दन किया। परम यशस्वी महाराजने भी उन्हें प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर देकर सन्तुष्ट किया॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 506) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/6/