श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.41

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैः

श्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः।

न वै तथा चेतनया बहिष्कृते

हुताशने पारमहंस्यपर्यगुः॥ ४१

aśnātyanantaḥ khalu tattvakovidaiḥ

śraddhāhutaṃ yanmukha ijyanāmabhiḥ|

na vai tathā cetanayā bahiṣkṛte

hutāśane pāramahaṃsyaparyaguḥ|| 41

अर्थ

उपनिषदोंके ज्ञान-परक वचन एकमात्र जिनमें ही गतार्थ होते हैं, वे भगवान् अनन्त इन्द्रादि यज्ञीय देवताओंके नामसे तत्त्वज्ञानियोंद्वारा ब्राह्मणोंके मुखमें श्रद्धापूर्वक हवन किये हुए पदार्थको जैसे चावसे ग्रहण करते हैं, वैसे चेतनाशून्य अग्‍निमें होमे हुए द्रव्यको नहीं ग्रहण करते॥ ४१॥

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