श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.40

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

पुमाँल्लभेतानतिवेलमात्मनः

प्रसीदतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम्।

यन्‍नित्यसम्बन्धनिषेवया ततः

परं किमत्रास्ति मुखं हविर्भुजाम्॥ ४०

pumām̐llabhetānativelamātmanaḥ

prasīdato'tyantaśamaṃ svataḥ svayam|

yannityasambandhaniṣevayā tataḥ

paraṃ kimatrāsti mukhaṃ havirbhujām|| 40

अर्थ

इनकी नित्य सेवा करनेसे शीघ्र ही चित्त शुद्ध हो जानेके कारण मनुष्य स्वयं ही (ज्ञान और अभ्यास आदिके बिना ही) परम शान्तिरूप मोक्ष प्राप्त कर लेता है। अतः लोकमें इन ब्राह्मणोंसे बढ़कर दूसरा कौन है जो हविष्यभोजी देवताओंका मुख हो सके?॥ ४०॥

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