श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन्।

प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः॥ २४

ya uddharetkaraṃ rājā prajā dharmeṣvaśikṣayan|

prajānāṃ śamalaṃ bhuṅkte bhagaṃ ca svaṃ jahāti saḥ|| 24

अर्थ

जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्‍वर्यसे हाथ धो बैठता है॥ २४॥✎ 408

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #408 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को

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