prajānāṃ śamalaṃ bhuṅkte bhagaṃ ca svaṃ jahāti saḥ|| 24
अर्थ
जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है॥ २४॥✎ 408
य उद्धरेत्करं राजा प्रजा धर्मेष्वशिक्षयन्।
प्रजानां शमलं भुङ्क्ते भगं च स्वं जहाति सः॥ २४
जो राजा प्रजाको धर्ममार्गकी शिक्षा न देकर केवल उससे कर वसूल करनेमें लगा रहता है, वह केवल प्रजाके पापका ही भागी होता है और अपने ऐश्वर्यसे हाथ धो बैठता है॥ २४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.21.24 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 508) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/21/24/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)