श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.21.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 21 · अथैकविंशोऽध्यायः

चारु चित्रपदं श्लक्ष्णं मृष्टं गूढमविक्लवम्।

सर्वेषामुपकारार्थं तदा अनुवदन्‍निव॥ २०

cāru citrapadaṃ ślakṣṇaṃ mṛṣṭaṃ gūḍhamaviklavam|

sarveṣāmupakārārthaṃ tadā anuvadanniva|| 20

अर्थ

उनका भाषण अत्यन्त सुन्दर, विचित्र पदोंसे युक्त, स्पष्ट, मधुर, गम्भीर एवं निश्शंक था। मानो उस समय वे सबका उपकार करनेके लिये अपने अनुभवका ही अनुवाद कर रहे हों॥ २०॥✎ 1332

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1332 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नक्षत्र-मण्डलमें → नक्षत्रमण्डलमें

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