॥ श्रीहरिः ॥
भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः।
हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत१॥ ३७
bhagavānapi rājarṣeḥ sopādhyāyasya cācyutaḥ|
haranniva mano'muṣya svadhāma pratyapadyata|| 37
अर्थ
भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितोंका चित्त चुराते हुए अपने धामको सिधारे॥ ३७॥✎ 406 407
भगवानपि राजर्षेः सोपाध्यायस्य चाच्युतः।
हरन्निव मनोऽमुष्य स्वधाम प्रत्यपद्यत॥ ३७
भगवान् अच्युत भी राजा पृथु एवं उनके पुरोहितोंका चित्त चुराते हुए अपने धामको सिधारे॥ ३७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.20.37 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 505) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/20/37/टिप्पणियाँ
- १
प्रा० पा०—प्रत्यगात्पुनः।
(मुद्रित पृष्ठ 505)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
- #406 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्को
- #407 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्ने