श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.36

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

यज्ञेश्‍वरधिया राज्ञा वाग्वित्ताञ्जलिभक्तितः।

सभाजिता ययुः सर्वे वैकुण्ठानुगतास्ततः॥ ३६

yajñeśvaradhiyā rājñā vāgvittāñjalibhaktitaḥ|

sabhājitā yayuḥ sarve vaikuṇṭhānugatāstataḥ|| 36

अर्थ

महाराज पृथुने वहाँ जो देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, सिद्ध, चारण, नाग, किन्‍नर, अप्सरा, मनुष्य और पक्षी आदि अनेक प्रकारके प्राणी एवं भगवान्‌के पार्षद आये थे, उन सभीका भगवद्बुद्धिसे भक्तिपूर्वक वाणी और धनके द्वारा हाथ जोड़कर पूजन किया। इसके बाद वे सब अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ३५-३६॥✎ 406 407

यह अर्थ श्लोक 35–36 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #406 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् को → भगवान्‌को
  • #407 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् ने → भगवान्‌ने

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