श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.20.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 20 · अथ विंशोऽध्यायः

त्वन्माययाद्धा जन ईश खण्डितो

यदन्यदाशास्त ऋतात्मनोऽबुधः।

यथा चरेद‍्बालहितं पिता स्वयं

तथा त्वमेवार्हसि नः समीहितुम्॥ ३१

tvanmāyayāddhā jana īśa khaṇḍito

yadanyadāśāsta ṛtātmano'budhaḥ|

yathā caredbālahitaṃ pitā svayaṃ

tathā tvamevārhasi naḥ samīhitum|| 31

अर्थ

प्रभो! आपकी मायासे ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप आपसे विमुख होकर अज्ञानवश अन्य स्त्री-पुत्रादिकी इच्छा करता है। फिर भी जिस प्रकार पिता पुत्रकी प्रार्थनाकी अपेक्षा न रखकर अपने-आप ही पुत्रका कल्याण करता है, उसी प्रकार आप भी हमारी इच्छाकी अपेक्षा न करके हमारे हितके लिये स्वयं ही प्रयत्न करें॥ ३१॥✎ 1331

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1331 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): पुरु-षोत्तमकी → पुरुषोत्तमकी

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें