॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.20.28
जगज्जनन्यां जगदीश वैशसं
स्यादेव यत्कर्मणि नः समीहितम्।
करोषि फल्ग्वप्युरु दीनवत्सलः
स्व एव धिष्ण्येऽभिरतस्य किं तया॥ २८
jagajjananyāṃ jagadīśa vaiśasaṃ
syādeva yatkarmaṇi naḥ samīhitam|
karoṣi phalgvapyuru dīnavatsalaḥ
sva eva dhiṣṇye'bhiratasya kiṃ tayā|| 28
अर्थ
जगदीश्वर! जगज्जननी लक्ष्मीजीके हृदयमें मेरे प्रति विरोधभाव होनेकी संभावना तो है ही; क्योंकि जिस आपके सेवाकार्यमें उनका अनुराग है, उसीके लिये मैं भी लालायित हूँ। किन्तु आप दीनोंपर दया करते हैं, उनके तुच्छ कर्मोंको भी बहुत करके मानते हैं। इसलिये मुझे आशा है कि हमारे झगड़ेमें भी आप मेरा ही पक्ष लेंगे। आप तो अपने स्वरूपमें ही रमण करते हैं; आपको भला, लक्ष्मीजीसे भी क्या लेना है॥ २८॥✎ 1331