श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

तेऽपि विश्‍वसृजः सत्रं सहस्रपरिवत्सरान्।

संविधाय महेष्वास यत्रेज्य ऋषभो हरिः॥ ३४

te'pi viśvasṛjaḥ satraṃ sahasraparivatsarān|

saṃvidhāya maheṣvāsa yatrejya ṛṣabho hariḥ|| 34

अर्थ

वहाँ प्रजापतिलोग जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें पुरुषोत्तम श्रीहरि ही उपास्यदेव थे और वह यज्ञ एक हजार वर्षमें समाप्त होनेवाला था। उसे समाप्त कर उन प्रजापतियोंने श्रीगंगा-यमुनाके संगममें यज्ञान्त स्नान किया और फिर प्रसन्‍न मनसे वे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ३४-३५॥

यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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