वहाँ प्रजापतिलोग जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें पुरुषोत्तम श्रीहरि ही उपास्यदेव थे और वह यज्ञ एक हजार वर्षमें समाप्त होनेवाला था। उसे समाप्त कर उन प्रजापतियोंने श्रीगंगा-यमुनाके संगममें यज्ञान्त स्नान किया और फिर प्रसन्न मनसे वे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ३४-३५॥
यह अर्थ श्लोक 34–35 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।
तेऽपि विश्वसृजः सत्रं सहस्रपरिवत्सरान्।
संविधाय महेष्वास यत्रेज्य ऋषभो हरिः॥ ३४
वहाँ प्रजापतिलोग जो यज्ञ कर रहे थे, उसमें पुरुषोत्तम श्रीहरि ही उपास्यदेव थे और वह यज्ञ एक हजार वर्षमें समाप्त होनेवाला था। उसे समाप्त कर उन प्रजापतियोंने श्रीगंगा-यमुनाके संगममें यज्ञान्त स्नान किया और फिर प्रसन्न मनसे वे अपने-अपने स्थानोंको चले गये॥ ३४-३५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.2.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 415) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/2/34/