श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

तस्यैवं वदतः शापं भृगोः स भगवान् भवः।

निश्‍चक्राम ततः किंचिद्विमना इव सानुगः॥ ३३

tasyaivaṃ vadataḥ śāpaṃ bhṛgoḥ sa bhagavān bhavaḥ|

niścakrāma tataḥ kiṃcidvimanā iva sānugaḥ|| 33

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—विदुरजी! भृगु ऋषिके इस प्रकार शाप देनेपर भगवान् शंकर कुछ खिन्‍न-से हो वहाँसे अपने अनुयायियोंसहित चल दिये॥ ३३॥

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