श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया।

कर्मतन्त्रं वितनुते वेदवादविपन्‍नधीः॥ २२

gṛheṣu kūṭadharmeṣu sakto grāmyasukhecchayā|

karmatantraṃ vitanute vedavādavipannadhīḥ|| 22

अर्थ

यह ‘चातुर्मास्य यज्ञ करनेवालेको अक्षय पुण्य प्राप्त होता है’ आदि अर्थवादरूप वेदवाक्योंसे मोहित एवं विवेकभ्रष्ट होकर विषयसुखकी इच्छासे कपटधर्ममय गृहस्थाश्रममें आसक्त रहकर कर्मकाण्डमें ही लगा रहता है। इसकी बुद्धि देहादिमें आत्मभावका चिन्तन करनेवाली है; उसके द्वारा इसने आत्मस्वरूपको भुला दिया है; यह साक्षात् पशुके ही समान है, अतः अत्यन्त स्त्री-लम्पट हो और शीघ्र ही इसका मुँह बकरेका हो जाय॥ २२-२३॥

यह अर्थ श्लोक 22–23 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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