श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.2.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि।

द्रुह्यत्यज्ञः पृथग्दृष्टिस्तत्त्वतो विमुखो भवेत्॥ २१

ya etanmartyamuddiśya bhagavatyapratidruhi|

druhyatyajñaḥ pṛthagdṛṣṭistattvato vimukho bhavet|| 21

अर्थ

वे बोले—‘जो इस मरणधर्मा शरीरमें ही अभिमान करके किसीसे भी द्रोह न करनेवाले भगवान् शंकरसे द्वेष करता है, वह भेद-बुद्धिवाला मूर्ख दक्ष, तत्त्वज्ञानसे विमुख ही रहे॥ २१॥

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