॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.2.15
चिताभस्मकृतस्नानः प्रेतस्रङ्न्रस्थिभूषणः।
शिवापदेशो ह्यशिवो मत्तो मत्तजनप्रियः।
पतिः प्रमथभूतानां तमोमात्रात्मकात्मनाम्॥ १५
citābhasmakṛtasnānaḥ pretasraṅnrasthibhūṣaṇaḥ|
śivāpadeśo hyaśivo matto mattajanapriyaḥ|
patiḥ pramathabhūtānāṃ tamomātrātmakātmanām|| 15
अर्थ
यह सारे शरीरपर चिताकी अपवित्र भस्म लपेटे रहता है, गलेमें भूतोंके पहननेयोग्य नरमुण्डोंकी माला और सारे शरीरमें हड्डियोंके गहने पहने रहता है। यह बस, नामभरका ही शिव है, वास्तवमें है पूरा अशिव—अमंगलरूप। जैसे यह स्वयं मतवाला है, वैसे ही इसे मतवाले ही प्यारे लगते हैं। भूत-प्रेत-प्रमथ आदि निरे तमोगुणी स्वभाववाले जीवोंका यह नेता है॥ १५॥