श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.33

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

नैवात्मने महेन्द्राय रोषमाहर्तुमर्हसि।

उभावपि हि भद्रं ते उत्तमश्लोकविग्रहौ॥ ३३

naivātmane mahendrāya roṣamāhartumarhasi|

ubhāvapi hi bhadraṃ te uttamaślokavigrahau|| 33

अर्थ

आपका मंगल हो! आप और इन्द्र—दोनोंकी पवित्रकीर्ति भगवान् श्रीहरिके शरीर हैं; इसलिये अपने ही स्वरूपभूत इन्द्रके प्रति आपको क्रोध नहीं करना चाहिये॥ ३३॥✎ 404

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #404 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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