अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित्॥ ३२
pṛthukīrteḥ pṛthorbhūyāttarhyekonaśatakratuḥ|
alaṃ te kratubhiḥ sviṣṭairyadbhavānmokṣadharmavit|| 32
अर्थ
अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथुके निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो।’ फिर राजर्षि पृथुसे कहा, ‘राजन्! आप तो मोक्षधर्मके जाननेवाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानोंकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३२॥✎ 404
पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतुः।
अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित्॥ ३२
अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथुके निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो।’ फिर राजर्षि पृथुसे कहा, ‘राजन्! आप तो मोक्षधर्मके जाननेवाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानोंकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.32 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 499) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/32/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)