श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

पृथुकीर्तेः पृथोर्भूयात्तर्ह्येकोनशतक्रतुः।

अलं ते क्रतुभिः स्विष्टैर्यद्भवान्मोक्षधर्मवित्॥ ३२

pṛthukīrteḥ pṛthorbhūyāttarhyekonaśatakratuḥ|

alaṃ te kratubhiḥ sviṣṭairyadbhavānmokṣadharmavit|| 32

अर्थ

अच्छा, परमयशस्वी महाराज पृथुके निन्यानबे ही यज्ञ रहने दो।’ फिर राजर्षि पृथुसे कहा, ‘राजन्! आप तो मोक्षधर्मके जाननेवाले हैं; अतः अब आपको इन यज्ञानुष्ठानोंकी आवश्यकता नहीं है ॥ ३२॥✎ 404

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #404 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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