महाराज पृथुके यज्ञमें सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्वर भगवान् हरिने यज्ञेश्वररूपसे साक्षात् दर्शन दिया था॥ ३॥✎ 401
यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्भगवान् हरिरीश्वरः।
अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः॥ ३
महाराज पृथुके यज्ञमें सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्वर भगवान् हरिने यज्ञेश्वररूपसे साक्षात् दर्शन दिया था॥ ३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.3 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 496) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/19/3/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)