श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.3

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

यत्र यज्ञपतिः साक्षाद्भगवान् हरिरीश्‍वरः।

अन्वभूयत सर्वात्मा सर्वलोकगुरुः प्रभुः॥ ३

yatra yajñapatiḥ sākṣādbhagavān harirīśvaraḥ|

anvabhūyata sarvātmā sarvalokaguruḥ prabhuḥ|| 3

अर्थ

महाराज पृथुके यज्ञमें सबके अन्तरात्मा सर्वलोकपूज्य जगदीश्‍वर भगवान् हरिने यज्ञेश्‍वररूपसे साक्षात् दर्शन दिया था॥ ३॥✎ 401

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #401 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें