श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.2

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

तदभिप्रेत्य भगवान् कर्मातिशयमात्मनः।

शतक्रतुर्न ममृषे पृथोर्यज्ञमहोत्सवम्॥ २

tadabhipretya bhagavān karmātiśayamātmanaḥ|

śatakraturna mamṛṣe pṛthoryajñamahotsavam|| 2

अर्थ

यह देखकर भगवान् इन्द्रको विचार हुआ कि इस प्रकार तो पृथुके कर्म मेरे कर्मोंकी अपेक्षा भी बढ़ जायँगे। इसलिये वे उनके यज्ञमहोत्सवको सहन न कर सके॥ २॥✎ 401

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #401 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें