श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.24

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

एवमिन्द्रे हरत्यश्‍वं वैन्ययज्ञजिघांसया।

तद‍्गृहीतविसृष्टेषु पाखण्डेषु मतिर्नृणाम्॥ २४

evamindre haratyaśvaṃ vainyayajñajighāṃsayā|

tadgṛhītavisṛṣṭeṣu pākhaṇḍeṣu matirnṛṇām|| 24

अर्थ

इस प्रकार पृथुके यज्ञका विध्वंस करनेके लिये यज्ञपशुको चुराते समय इन्द्रने जिन्हें कई बार ग्रहण करके त्यागा था, उन ‘नग्न’, ‘रक्ताम्बर’ तथा ‘कापालिक’ आदि पाखण्डपूर्ण आचारोंमें मनुष्योंकी बुद्धि प्रायः मोहित हो जाती है; क्योंकि ये नास्तिकमत देखनेमें सुन्दर हैं और बड़ी-बड़ी युक्तियोंसे अपने पक्षका समर्थन करते हैं। वास्तवमें ये उपधर्ममात्र हैं। लोग भ्रमवश धर्म मानकर उनमें आसक्त हो जाते हैं॥ २४-२५॥✎ 402 403

यह अर्थ श्लोक 24–25 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #402 शब्दोंके बीचका स्थान: होजाते → हो जाते
  • #403 शब्दोंके बीचका स्थान: उपधर्ममात्रहैं। → उपधर्ममात्र हैं।

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