सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट्॥ २१
atriṇā coditastasmai sandadhe viśikhaṃ ruṣā|
so'śvaṃ rūpaṃ ca taddhitvā tasthāvantarhitaḥ svarāṭ|| 21
अर्थ
तब अत्रिने राजकुमारको फिर उकसाया और उसने गुस्सेमें भरकर इन्द्रको लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २१॥✎ 402403
अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा।
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट्॥ २१
तब अत्रिने राजकुमारको फिर उकसाया और उसने गुस्सेमें भरकर इन्द्रको लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 498) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/19/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)