श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.19.21

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 19 · अथैकोनविंशोऽध्यायः

अत्रिणा चोदितस्तस्मै सन्दधे विशिखं रुषा।

सोऽश्‍वं रूपं च तद्धित्वा तस्थावन्तर्हितः स्वराट्॥ २१

atriṇā coditastasmai sandadhe viśikhaṃ ruṣā|

so'śvaṃ rūpaṃ ca taddhitvā tasthāvantarhitaḥ svarāṭ|| 21

अर्थ

तब अत्रिने राजकुमारको फिर उकसाया और उसने गुस्सेमें भरकर इन्द्रको लक्ष्य बनाकर अपना बाण चढ़ाया। यह देखते ही देवराज उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये॥ २१॥✎ 402 403

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #402 शब्दोंके बीचका स्थान: होजाते → हो जाते
  • #403 शब्दोंके बीचका स्थान: उपधर्ममात्रहैं। → उपधर्ममात्र हैं।

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