सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट्।
वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान्॥ १७
so'śvaṃ rūpaṃ ca taddhitvā tasmā antarhitaḥ svarāṭ|
vīraḥ svapaśumādāya pituryajñamupeyivān|| 17
अर्थ
स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया॥ १७॥
सोऽश्वं रूपं च तद्धित्वा तस्मा अन्तर्हितः स्वराट्।
वीरः स्वपशुमादाय पितुर्यज्ञमुपेयिवान्॥ १७
स्वर्गपति इन्द्र उसे पीछे आते देख, उस वेष और घोड़ेको छोड़कर वहीं अन्तर्धान हो गये और वह वीर अपना यज्ञपशु लेकर पिताकी यज्ञशालामें लौट आया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.19.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 497) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/19/17/