राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा-ऋतु बीत जानेपर भी मेरे ऊपर इन्द्रका बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे—मेरे भीतरकी आर्द्रता सूखने न पावे। यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा’॥ ११॥
समां च कुरु मां राजन्देववृष्टं यथा पयः।
अपर्तावपि भद्रं ते उपावर्तेत मे विभो॥ ११
राजन्! एक बात और है; आपको मुझे समतल करना होगा, जिससे कि वर्षा-ऋतु बीत जानेपर भी मेरे ऊपर इन्द्रका बरसाया हुआ जल सर्वत्र बना रहे—मेरे भीतरकी आर्द्रता सूखने न पावे। यह आपके लिये बहुत मंगलकारक होगा’॥ ११॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.18.11 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 494) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/18/11/