श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.35

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

अपामुपस्थे मयि नाव्यवस्थिताः

प्रजा भवानद्य रिरक्षिषुः किल।

स वीरमूर्तिः समभूद्धराधरो

यो मां पयस्युग्रशरो जिघांससि॥ ३५

apāmupasthe mayi nāvyavasthitāḥ

prajā bhavānadya rirakṣiṣuḥ kila|

sa vīramūrtiḥ samabhūddharādharo

yo māṃ payasyugraśaro jighāṃsasi|| 35

अर्थ

इस प्रकार एक बार तो मेरा उद्धार करके आपने धराधर नाम पाया था; आज वही आप वीरमूर्तिसे जलके ऊपर नौकाके समान स्थित मेरे ही आश्रय रहनेवाली प्रजाकी रक्षा करनेके अभिप्रायसे पैने-पैने बाण चढ़ाकर दूध न देनेके अपराधमें मुझे मारना चाहते हैं॥ ३५॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें