॥ श्रीहरिः ॥
स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद्
भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो।
संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला-
दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः॥ ३४
sa vai bhavānātmavinirmitaṃ jagad
bhūtendriyāntaḥkaraṇātmakaṃ vibho|
saṃsthāpayiṣyannaja māṃ rasātalā-
dabhyujjahārāmbhasa ādisūkaraḥ|| 34
अर्थ
अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत्की स्थितिके लिये आदिवराहरूप होकर मुझे रसातलसे जलके बाहर लाये थे॥ ३४॥
स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद्
भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो।
संस्थापयिष्यन्नज मां रसातला-
दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः॥ ३४
अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत्की स्थितिके लिये आदिवराहरूप होकर मुझे रसातलसे जलके बाहर लाये थे॥ ३४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.17.34 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 492) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/17/34/