श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.34

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

स वै भवानात्मविनिर्मितं जगद्

भूतेन्द्रियान्तःकरणात्मकं विभो।

संस्थापयिष्यन्‍नज मां रसातला-

दभ्युज्जहाराम्भस आदिसूकरः॥ ३४

sa vai bhavānātmavinirmitaṃ jagad

bhūtendriyāntaḥkaraṇātmakaṃ vibho|

saṃsthāpayiṣyannaja māṃ rasātalā-

dabhyujjahārāmbhasa ādisūkaraḥ|| 34

अर्थ

अजन्मा प्रभो! आप ही अपने रचे हुए भूत, इन्द्रिय और अन्तःकरणरूप जगत‍्की स्थितिके लिये आदिवराहरूप होकर मुझे रसातलसे जलके बाहर लाये थे॥ ३४॥

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें