श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

नूनं बतेशस्य समीहितं जनै-

स्तन्मायया दुर्जययाकृतात्मभिः।

न लक्ष्यते यस्त्वकरोदकारयद्-

योऽनेक एकः परतश्‍च ईश्‍वरः॥ ३२

nūnaṃ bateśasya samīhitaṃ janai-

stanmāyayā durjayayākṛtātmabhiḥ|

na lakṣyate yastvakarodakārayad-

yo'neka ekaḥ parataśca īśvaraḥ|| 32

अर्थ

आप एक होकर भी मायावश अनेक रूप जान पड़ते हैं तथा आपने स्वयं ब्रह्माको रचकर उनसे विश्‍वकी रचना करायी है। आप साक्षात् सर्वेश्‍वर हैं, आपकी लीलाओंको अजितेन्द्रिय लोग कैसे जान सकते हैं? उनकी बुद्धि तो आपकी दुर्जय मायासे विक्षिप्त हो रही है॥ ३२॥

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