श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.17.31

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 17 · अथ सप्तदशोऽध्यायः

य एतदादावसृजच्चराचरं

स्वमाययाऽऽत्माश्रययावितर्क्यया।

तयैव सोऽयं किल गोप्तुमुद्यतः

कथं नु मां धर्मपरो जिघांसति॥ ३१

ya etadādāvasṛjaccarācaraṃ

svamāyayā''tmāśrayayāvitarkyayā|

tayaiva so'yaṃ kila goptumudyataḥ

kathaṃ nu māṃ dharmaparo jighāṃsati|| 31

अर्थ

कल्पके आरम्भमें आपने अपने आश्रित रहनेवाली अनिर्वचनीया मायासे ही इस चराचर जगत‍्की रचना की थी और उस मायाके ही द्वारा आप इसका पालन करनेके लिये तैयार हुए हैं। आप धर्मपरायण हैं; फिर भी मुझ गोरूपधारिणीको किस प्रकार मारना चाहते हैं?॥ ३१॥

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