श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.15.9

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

ब्रह्मा जगद‍्गुरुर्देवैः सहासृत्य सुरेश्‍वरैः।

वैन्यस्य दक्षिणे हस्ते दृष्ट्वा चिह्नं गदाभृतः॥ ९

brahmā jagadgururdevaiḥ sahāsṛtya sureśvaraiḥ|

vainyasya dakṣiṇe haste dṛṣṭvā cihnaṃ gadābhṛtaḥ|| 9

अर्थ

जगद‍्गुरु ब्रह्माजी देवता और देवेश्‍वरोंके साथ पधारे। उन्होंने वेनकुमार पृथुके दाहिने हाथमें भगवान् विष्णुकी हस्तरेखाएँ और चरणोंमें कमलका चिह्न देखकर उन्हें श्रीहरिका ही अंश समझा; क्योंकि जिसके हाथमें दूसरी रेखाओंसे बिना कटा हुआ चक्रका चिह्न होता है, वह भगवान्‌का ही अंश होता है॥ ९-१०॥

यह अर्थ श्लोक 9–10 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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