पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं॥ ६॥✎ 3901997
एष साक्षाद्धरेरंशो जातो लोकरिरक्षया।
इयं च तत्परा हि श्रीरनुजज्ञेऽनपायिनी॥ ६
पृथुके रूपमें साक्षात् श्रीहरिके अंशने ही संसारकी रक्षाके लिये अवतार लिया है और अर्चिके रूपमें, निरन्तर भगवान्की सेवामें रहनेवाली उनकी नित्य सहचरी श्रीलक्ष्मीजी ही प्रकट हुई हैं॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.15.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 483) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/15/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)