श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

इति तेऽसत्कृतास्तेन द्विजाः पण्डितमानिना।

भग्नायां भव्ययाच्ञायां तस्मै विदुर चुक्रुधुः॥ ३०

iti te'satkṛtāstena dvijāḥ paṇḍitamāninā|

bhagnāyāṃ bhavyayācñāyāṃ tasmai vidura cukrudhuḥ|| 30

अर्थ

कल्याणरूप विदुरजी! अपनेको बड़ा बुद्धिमान् समझनेवाले वेनने जब उन मुनियोंका इस प्रकार अपमान किया, तब अपनी माँगको व्यर्थ हुई देख वे उसपर अत्यन्त कुपित हो गये॥ ३०॥✎ 388 1603

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्‌की
  • #1603 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज-सिंहासनके → राजसिंहासनके

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