श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.29

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

मैत्रेय उवाच

इत्थं विपर्ययमतिः पापीयानुत्पथं गतः।

अनुनीयमानस्तद्याच्ञां न चक्रे१ भ्रष्टमंगलः॥ २९

itthaṃ viparyayamatiḥ pāpīyānutpathaṃ gataḥ|

anunīyamānastadyācñāṃ na cakre bhraṣṭamaṃgalaḥ|| 29

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—इस प्रकार विपरीत बुद्धि होनेके कारण वह अत्यन्त पापी और कुमार्गगामी हो गया था। उसका पुण्य क्षीण हो चुका था, इसलिये मुनियोंके बहुत विनयपूर्वक प्रार्थना करनेपर भी उसने उनकी बातपर ध्यान न दिया॥ २९॥✎ 388 1603

टिप्पणियाँ

  1. १

    प्रा० पा०—भेजे।

    (मुद्रित पृष्ठ 481)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #388 शब्दोंके बीचका स्थान: श्रीविष्णुभगवान् की → श्रीविष्णुभगवान्‌की
  • #1603 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: राज-सिंहासनके → राजसिंहासनके

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