श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.22

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

यज्ञेन युष्मद्विषये द्विजातिभि-

र्वितायमानेन सुराः कला हरेः।

स्विष्टाः सुतुष्टाः प्रदिशन्ति वाञ्छितं

तद्धेलनं नार्हसि वीर चेष्टितुम्॥ २२

yajñena yuṣmadviṣaye dvijātibhi-

rvitāyamānena surāḥ kalā hareḥ|

sviṣṭāḥ sutuṣṭāḥ pradiśanti vāñchitaṃ

taddhelanaṃ nārhasi vīra ceṣṭitum|| 22

अर्थ

जब आपके राज्यमें ब्राह्मणलोग यज्ञोंका अनुष्ठान करेंगे, तब उनकी पूजासे प्रसन्‍न होकर भगवान्‌के अंशस्वरूप देवता आपको मनचाहा फल देंगे। अतः वीरवर! आपको यज्ञादि धर्मानुष्ठान बंद करके देवताओंका तिरस्कार नहीं करना चाहिये॥ २२॥

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