श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

राजन्‍नसाध्वमात्येभ्यश्चोरादिभ्यः प्रजा नृपः।

रक्षन् यथा बलिं गृह्णन्‍निह प्रेत्य च मोदते॥ १७

rājannasādhvamātyebhyaścorādibhyaḥ prajā nṛpaḥ|

rakṣan yathā baliṃ gṛhṇanniha pretya ca modate|| 17

अर्थ

जो राजा दुष्ट मन्त्री और चोर आदिसे अपनी प्रजाकी रक्षा करते हुए न्यायानुकूल कर लेता है, वह इस लोकमें और परलोकमें दोनों जगह सुख पाता है॥ १७॥

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