श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.10

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अहेरिव पयःपोषः पोषकस्याप्यनर्थभृत्।

वेनः प्रकृत्यैव खलः सुनीथागर्भसम्भवः॥ १०

aheriva payaḥpoṣaḥ poṣakasyāpyanarthabhṛt|

venaḥ prakṛtyaiva khalaḥ sunīthāgarbhasambhavaḥ|| 10

अर्थ

सुनीथाकी कोखसे उत्पन्‍न हुआ यह वेन स्वभावसे ही दुष्ट है। परन्तु साँपको दूध पिलानेके समान इसको पालना, पालनेवालोंके लिये अनर्थका कारण हो गया॥ १०॥✎ 1602

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1602 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: समझ-कर → समझकर

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