श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
⌕

॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.14.1

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अथ चतुर्दशोऽध्यायः

राजा वेनकी कथा

मैत्रेय उवाच

भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः।

गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम्॥ १ ✎ 1029

bhṛgvādayaste munayo lokānāṃ kṣemadarśinaḥ|

goptaryasati vai nṝṇāṃ paśyantaḥ paśusāmyatām|| 1

अर्थ

श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं॥ १॥

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1029 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नृणां → नॄणां

पढ़नेकी विधि

अक्षरका आकार
सामान्य
अध्यायमें क्या दिखे
रोमन लिप्यन्तरण (IAST)
पंक्तियोंके बीच
रंग
सहायता

ये विकल्प केवल इसी ब्राउज़रमें रहते हैं; कहीं भेजे नहीं जाते। कुंजियाँ: ?

↑ ↓ चुनें · Enter खोलें · Esc बन्द

कुंजियाँ

←→
पिछला या अगला पृष्ठ (श्लोक, या अध्याय)
/
खोज
CtrlK
किसी अध्याय या श्लोकपर सीधे जाएँ (Mac: ⌘ K)
AltA
पढ़नेकी विधि
?
यह सूची
Esc
खुली सूची बन्द करें