गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम्॥ १ ✎ 1029
bhṛgvādayaste munayo lokānāṃ kṣemadarśinaḥ|
goptaryasati vai nṝṇāṃ paśyantaḥ paśusāmyatām|| 1
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं॥ १॥
भृग्वादयस्ते मुनयो लोकानां क्षेमदर्शिनः।
गोप्तर्यसति वै नॄणां पश्यन्तः पशुसाम्यताम्॥ १
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—वीरवर विदुरजी! सभी लोकोंकी कुशल चाहनेवाले भृगु आदि मुनियोंने देखा कि अंगके चले जानेसे अब पृथ्वीकी रक्षा करनेवाला कोई नहीं रह गया है, सब लोग पशुओंके समान उच्छृंखल होते जा रहे हैं॥ १॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.14.1 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 478) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/4/14/1/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1029 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): नृणां → नॄणां