जब सन्तानके लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरिका आवाहन किया जायगा, तब देवतालोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे॥ ३३॥✎ 1601
तथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः।
यद्यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः॥ ३३
जब सन्तानके लिये साक्षात् यज्ञपुरुष श्रीहरिका आवाहन किया जायगा, तब देवतालोग स्वयं ही अपना-अपना यज्ञ-भाग ग्रहण करेंगे॥ ३३॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.33 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 476) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/33/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)