श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.32

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सुप्रजं नृप।

इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक्॥ ३२

tathā sādhaya bhadraṃ te ātmānaṃ suprajaṃ nṛpa|

iṣṭaste putrakāmasya putraṃ dāsyati yajñabhuk|| 32

अर्थ

आपका कल्याण हो! इसलिये पहले आप सुपुत्र प्राप्त करनेका कोई उपाय कीजिये। यदि आप पुत्रकी कामनासे यज्ञ करेंगे, तो भगवान् यज्ञेश्‍वर आपको अवश्य पुत्र प्रदान करेंगे ॥ ३२॥✎ 1601

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1601 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: सर्वगुण-सम्पन्‍न → सर्वगुणसम्पन्‍न

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