श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.30

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

नागच्छन्त्याहुता देवा न गृह्णन्ति ग्रहानिह।

सदसस्पतयो ब्रूत किमवद्यं मया कृतम्॥ ३०

nāgacchantyāhutā devā na gṛhṇanti grahāniha|

sadasaspatayo brūta kimavadyaṃ mayā kṛtam|| 30

अर्थ

‘सदस्यो! देवतालोग आवाहन करनेपर भी यज्ञमें नहीं आ रहे हैं और न सोमपात्र ही ग्रहण करते हैं; आप बतलाइये मुझसे ऐसा क्या अपराध हुआ है?’॥ ३०॥

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