॥ श्रीहरिः ॥
अंगो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः।
तत्प्रष्टुं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया॥ २९
aṃgo dvijavacaḥ śrutvā yajamānaḥ sudurmanāḥ|
tatpraṣṭuṃ vyasṛjadvācaṃ sadasyāṃstadanujñayā|| 29
अर्थ
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—ऋत्विजोंकी बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकोंकी अनुमतिसे मौन तोड़कर सदस्योंसे पूछा॥ २९॥
अंगो द्विजवचः श्रुत्वा यजमानः सुदुर्मनाः।
तत्प्रष्टुं व्यसृजद्वाचं सदस्यांस्तदनुज्ञया॥ २९
श्रीमैत्रेयजी कहते हैं—ऋत्विजोंकी बात सुनकर यजमान अंग बहुत उदास हुए। तब उन्होंने याजकोंकी अनुमतिसे मौन तोड़कर सदस्योंसे पूछा॥ २९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.13.29 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 476) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/13/29/