श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.13.20

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

अराजके तदा लोके दस्युभिः पीडिताः प्रजाः।

जातो नारायणांशेन पृथुराद्यः क्षितीश्‍वरः॥ २०

arājake tadā loke dasyubhiḥ pīḍitāḥ prajāḥ|

jāto nārāyaṇāṃśena pṛthurādyaḥ kṣitīśvaraḥ|| 20

अर्थ

प्यारे विदुरजी! मुनियोंके वाक्य वज्रके समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेनको शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णुके अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए॥ १९-२०॥

यह अर्थ श्लोक 19–20 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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