॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.13.19
यमङ्ग शेपुः कुपिता वाग्वज्रा मुनयः किल।
गतासोस्तस्य भूयस्ते ममन्थुर्दक्षिणं करम्॥ १९
yamaṅga śepuḥ kupitā vāgvajrā munayaḥ kila|
gatāsostasya bhūyaste mamanthurdakṣiṇaṃ karam|| 19
अर्थ
प्यारे विदुरजी! मुनियोंके वाक्य वज्रके समान अमोघ होते हैं; उन्होंने कुपित होकर वेनको शाप दिया और जब वह मर गया, तब कोई राजा न रहनेके कारण लोकमें लुटेरोंके द्वारा प्रजाको बहुत कष्ट होने लगा। यह देखकर उन्होंने वेनकी दाहिनी भुजाका मन्थन किया, जिससे भगवान् विष्णुके अंशावतार आदिसम्राट् महाराज पृथु प्रकट हुए॥ १९-२०॥