॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 4.12.47
महत्त्वमिच्छतां तीर्थं श्रोतुः शीलादयो गुणाः।
यत्र तेजस्तदिच्छूनां मानो यत्र मनस्विनाम्॥ ४७
mahattvamicchatāṃ tīrthaṃ śrotuḥ śīlādayo guṇāḥ|
yatra tejastadicchūnāṃ māno yatra manasvinām|| 47
अर्थ
इसे श्रवण करनेवालेको शीलादि गुणोंकी प्राप्ति होती है, जो महत्त्व चाहते हैं, उन्हें महत्त्वकी प्राप्ति करानेवाला स्थान मिलता है, जो तेज चाहते हैं, उन्हें तेज प्राप्त होता है और मनस्वियोंका मान बढ़ता है॥ ४७॥✎ 384