श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.46

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

श्रुत्वैतच्छ्रद्धयाभीक्ष्णमच्युतप्रियचेष्टितम्।

भवेद्भक्तिर्भगवति यया स्यात्क्लेशसंक्षयः॥ ४६

śrutvaitacchraddhayābhīkṣṇamacyutapriyaceṣṭitam|

bhavedbhaktirbhagavati yayā syātkleśasaṃkṣayaḥ|| 46

अर्थ

भगवद्भक्त ध्रुवके इस पवित्र चरित्रको जो श्रद्धापूर्वक बार-बार सुनते हैं, उन्हें भगवान्‌की भक्ति प्राप्त होती है, जिससे उनके सभी दुःखोंका नाश हो जाता है॥ ४६॥✎ 384

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #384 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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