कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलानेके समय खम्भेके चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेगवाला ज्योतिश्चक्र उस अविनाशी लोकके आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है॥ ३९॥
गम्भीरवेगोऽनिमिषं ज्योतिषां चक्रमाहितम्।
यस्मिन् भ्रमति कौरव्य मेढ्यामिव गवां गणः॥ ३९
कुरुनन्दन! जिस प्रकार दायँ चलानेके समय खम्भेके चारों ओर बैल घूमते हैं, उसी प्रकार यह गम्भीर वेगवाला ज्योतिश्चक्र उस अविनाशी लोकके आश्रय ही निरन्तर घूमता रहता है॥ ३९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.39 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 471) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/39/