श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.37

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

शान्ताः समदृशः शुद्धाः सर्वभूतानुरंजनाः।

यान्त्यञ्जसाच्युतपदमच्युतप्रियबान्धवाः॥ ३७

śāntāḥ samadṛśaḥ śuddhāḥ sarvabhūtānuraṃjanāḥ|

yāntyañjasācyutapadamacyutapriyabāndhavāḥ|| 37

अर्थ

जो शान्त, समदर्शी, शुद्ध और सब प्राणियोंको प्रसन्‍न रखनेवाले हैं तथा भगवद्भक्तोंको ही अपना एकमात्र सच्चा सुहृद‍् मानते हैं—ऐसे लोग सुगमतासे ही इस भगवद्धामको प्राप्त कर लेते हैं॥ ३७॥

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