वहाँ उन्होंने पवित्र जलमें स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसनसे बैठकर प्राणायामद्वारा वायुको वशमें किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूपका चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया॥ १७॥✎ 13241325
तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य
बद्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः।
स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्
ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ॥ १७
वहाँ उन्होंने पवित्र जलमें स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसनसे बैठकर प्राणायामद्वारा वायुको वशमें किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूपका चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया॥ १७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 4.12.17 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 469) · https://srimad-bhagavatam.vidhyamitra.com/4/12/17/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
#1324 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विराट्-रूपका → विराट्रूपका