श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 4.12.17

चतुर्थ स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तस्यां विशुद्धकरणः शिववार्विगाह्य

बद‍्ध्वाऽऽसनं जितमरुन्मनसाऽऽहृताक्षः।

स्थूले दधार भगवत्प्रतिरूप एतद्

ध्यायंस्तदव्यवहितो व्यसृजत्समाधौ॥ १७

tasyāṃ viśuddhakaraṇaḥ śivavārvigāhya

baddhvā''sanaṃ jitamarunmanasā''hṛtākṣaḥ|

sthūle dadhāra bhagavatpratirūpa etad

dhyāyaṃstadavyavahito vyasṛjatsamādhau|| 17

अर्थ

वहाँ उन्होंने पवित्र जलमें स्नानकर इन्द्रियोंको विशुद्ध (शान्त) किया। फिर स्थिर आसनसे बैठकर प्राणायामद्वारा वायुको वशमें किया। तदनन्तर मनके द्वारा इन्द्रियोंको बाह्य विषयोंसे हटाकर मनको भगवान्‌के स्थूल विराट्स्वरूपमें स्थिर कर दिया। उसी विराट्रूपका चिन्तन करते-करते वे अन्तमें ध्याता और ध्येयके भेदसे शून्य निर्विकल्प समाधिमें लीन हो गये और उस अवस्थामें विराट्रूपका भी परित्याग कर दिया॥ १७॥✎ 1324 1325

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1324 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): विराट्-रूपका → विराट्रूपका
  • #1325 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: विराट्-रूपका → विराट्रूपका

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